मोहरपाल उर्फ पप्पू की पुलिस हिरासत में पीट-पीटकर हत्या और शव गायब करने के मामले में अदालत ने सुनाई सजा, दोनों दोषियों पर 25-25 हजार रुपये का जुर्माना

एटा। जैथरा थाना क्षेत्र में करीब 21 वर्ष पहले पुलिस हिरासत में हुई मोहरपाल उर्फ पप्पू की मौत के मामले में बुधवार को सत्र न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया। लंबे समय तक चली सुनवाई, गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सत्र न्यायाधीश राकेश धर दुबे की अदालत ने तत्कालीन पुलिसकर्मी महावीर सिंह और गजराज सिंह को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने दोनों दोषियों पर 25-25 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। फैसला सुनाए जाने के बाद दोनों की जमानत निरस्त कर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

प्रधानी की रंजिश के बाद शुरू हुआ था विवाद

यह पूरा मामला वर्ष 2005 का है। जैथरा थाना क्षेत्र के गांव बहगों में प्रधानी के चुनाव को लेकर दो पक्षों के बीच रंजिश चल रही थी। इसी रंजिश के चलते दोनों पक्षों में विवाद हुआ था। विवाद के बाद दोनों पक्षों की ओर से थाने में शिकायतें दी गई थीं। आरोप है कि इसी मामले में पुलिस मोहरपाल उर्फ पप्पू को पूछताछ के लिए थाने लेकर आई थी।

परिवार का आरोप था कि थाने में मोहरपाल के साथ बर्बरतापूर्वक मारपीट की गई। उस समय थाने में तत्कालीन थाना प्रभारी मनीष कुमार, दरोगा गजराज सिंह, सिपाही महावीर सिंह समेत अन्य पुलिसकर्मी मौजूद थे। परिजनों का आरोप था कि पुलिस की पिटाई से मोहरपाल की हालत बिगड़ गई और बाद में उसकी मौत हो गई।

परिजनों को थाने से भगाने का आरोप

मामले में मृतक के परिजनों ने आरोप लगाया था कि जब उन्हें मोहरपाल को थाने लाए जाने की जानकारी मिली तो वे उसे देखने के लिए थाने पहुंचे। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने परिजनों को थाने से भगा दिया और उन्हें मोहरपाल से मिलने नहीं दिया गया।

परिजनों का दावा था कि पुलिस हिरासत में मोहरपाल की मौत होने के बाद उसके शव को ठिकाने लगाने का प्रयास किया गया। आरोप के मुताबिक शव को पुलिस वाहन में रखकर काली नदी में फेंक दिया गया। घटना की जानकारी क्षेत्र में फैलने के बाद परिजनों और ग्रामीणों में आक्रोश फैल गया और जैथरा थाने पर हंगामा हुआ। बाद में मोहरपाल का शव बरामद हुआ।

पांच पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज हुआ था मुकदमा

घटना के बाद मृतक के परिजनों की शिकायत पर तत्कालीन थाना प्रभारी मनीष कुमार समेत पांच पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। आरोपियों पर हत्या, अवैध हिरासत, मारपीट और साक्ष्य मिटाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई। जांच के दौरान पुलिसकर्मियों के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयान जुटाए गए। जांच पूरी होने के बाद सीबीसीआईडी ने आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया। इसके बाद मामला लंबे समय तक अदालत में विचाराधीन रहा।

दो आरोपियों की मुकदमे के दौरान हो चुकी मौत

मामले में नामजद पांच पुलिसकर्मियों में से तत्कालीन थाना प्रभारी मनीष कुमार और पुलिस वाहन चालक मिढ़ई लाल की मुकदमे की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो चुकी है। वहीं, महावीर सिंह और गजराज सिंह के खिलाफ न्यायालय में सुनवाई जारी रही। उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर अदालत ने दोनों को दोषी माना।

अभियोजन की मजबूत पैरवी से दोषसिद्धि

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अदालत के समक्ष गवाहों और दस्तावेजी साक्ष्यों को प्रस्तुत किया। अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता रेशपाल सिंह राठौर ने मामले में प्रभावी पैरवी करते हुए आरोपों को साबित करने के लिए अदालत के समक्ष महत्वपूर्ण तथ्य रखे।

अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद महावीर सिंह और गजराज सिंह को दोषी ठहराया। इसके बाद दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और 25-25 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया गया।

21 साल तक बेटे ने लड़ी न्याय की लड़ाई

फैसले के बाद मृतक मोहरपाल के बेटे सुनील ने कहा कि घटना के समय चुनाव का माहौल था। उनके पिता को 26 तारीख को पुलिस पकड़कर ले गई थी। अगले दिन उन्हें पीट-पीटकर मार दिए जाने का आरोप है। परिवार को 28 तारीख को जानकारी हुई कि उनके पिता की मौत हो चुकी है और शव भी गायब कर दिया गया है।

सुनील के मुताबिक परिवार को उस समय थाने से भी भगा दिया गया था। इसके बाद शुरू हुई न्याय की लड़ाई करीब 21 वर्ष तक चली। उन्होंने कहा कि परिवार ने न्याय पाने के लिए अपनी खेती तक बेच दी, लेकिन मुकदमा नहीं छोड़ा। इतने लंबे इंतजार के बाद अदालत ने दोषी पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है, जिससे परिवार को राहत मिली है।

‘बच्चे छोटे थे, न्याय की आस लगाए बैठे थे’

मोहरपाल की पत्नी गुड्डी देवी ने कहा कि उनके पति को चुनाव के दौरान पुलिस घर से ले गई थी। इसके बाद उनकी हत्या कर दी गई। घटना के समय उनके बच्चे बहुत छोटे थे। पति की मौत के बाद परिवार ने काफी दुख और परेशानियां झेलीं।

गुड्डी देवी ने कहा कि इतने वर्षों तक परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद थी। अदालत के फैसले के बाद उन्हें महसूस हुआ कि इतने लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार न्याय मिला है।

21 साल पुराने मामले में फैसला बना चर्चा का विषय

पुलिस हिरासत में मौत से जुड़े इस पुराने मामले में 21 वर्ष बाद आया फैसला क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। अदालत द्वारा दो पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने से पीड़ित परिवार को लंबे कानूनी संघर्ष के बाद राहत मिली है। मामले की खास बात यह रही कि घटना के कई वर्ष बीत जाने के बावजूद मुकदमे की सुनवाई जारी रही और उपलब्ध गवाहों व साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने अपना निर्णय सुनाया।